प्रिय मित्र, नमस्कार! 🙏 पिछली चिट्ठी में मैंने पूछा था कि रामायण या महाभारत का कौन-सा पात्र आपको सबसे दिलचस्प लगता है, जिसे आम तौर पर खलनायक माना जाता है। आप में से कई लोगों ने जवाब लिखा। शकुनि का नाम आया, दुर्योधन का भी। पर सबसे ज़्यादा बार लौटकर एक ही नाम आया। कर्ण। इन नामों में एक बात साझा है। इनमें से किसी को भी हम पूरी तरह बुरा नहीं कह पाते। और कर्ण को शायद सबसे कम। तो इस बार बात कर्ण की। कर्ण ने यह नहीं चुना था कि वह किसके घर जन्म लेगा, या लोग उसे किस नाम से पुकारेंगे। पर आगे चलकर उसने...
about 12 hours ago • 1 min read
प्रिय मित्र, नमस्कार! 🙏 इस नवरात्रि मैं सिडनी के बॉकहम हिल्स में दुर्गा पंडाल गया था। पूजा हुई, पुष्पांजलि हुई, ढाक बजी, और प्रसाद की वही लंबी क़तार। पर एक चीज़ वहाँ नहीं थी। सिडनी में रावण का पुतला नहीं जलाया जाता। यहाँ इसकी इजाज़त नहीं है। दशहरा और पुतला हमारे मन में साथ-साथ जुड़े हैं, इसलिए पहली बार यह थोड़ा अजीब लगता है। फिर लगता है कि शायद ठीक ही है। क्योंकि पुतला जला देना दशहरे का सबसे आसान हिस्सा है। मुश्किल हिस्सा वह सवाल है, जो आग बुझने के बाद भी खड़ा रहता है। 20 अक्टूबर को दशहरा है।...
7 days ago • 1 min read
प्रिय मित्र, नमस्कार! 🙏 नवरात्रि के दिन हैं। घरों में कलश रखे हैं, कहीं गरबा हो रहा है, कहीं रामलीला की तैयारी चल रही है। इन दिनों एक बात मेरे मन में बार-बार आती है, और आज वही आपसे कहना चाहता हूँ। हमारे यहाँ शक्ति को स्त्री का रूप दिया गया है। यह सिर्फ़ पूजा की बात नहीं है, कल्पना की बात है। जब हमें ताकत की तस्वीर बनानी थी, तो हमने किसे चुना? एक स्त्री को। और यह बात हमारे साहित्य में भी उतनी ही गहरी उतरी है जितनी मंदिर में। 💪 जो पंक्ति सबको याद है एक पंक्ति है, जो शायद आपको भी याद होगी। स्कूल...
14 days ago • 1 min read
प्रिय मित्र, नमस्कार! हम सबके साथ कभी न कभी ऐसा हुआ होगा कि फोन पर कोई तीखा संदेश आया, और उँगलियाँ तुरंत उसका कड़ा जवाब टाइप करने लगीं। उस पल लगता है कि तुरंत पलटकर जवाब न दिया, तो बात अधूरी रह जाएगी। लेकिन अगर किसी वजह से वह जवाब भेजने से रुक जाए—फोन एक तरफ रखकर हम टहलने निकल जाएँ या किसी दूसरे काम में लग जाएँ—तो आधे घंटे बाद वही लिखा हुआ संदेश देखकर अजीब लगता है। लगता है कि अच्छा हुआ, वह उस समय नहीं भेजा गया। थोड़ी देर का वह ठहराव किसी रिश्ते को बिखरने से बचा लेता है। दूसरी तरफ, इसी का एक...
21 days ago • 1 min read
प्रिय मित्र, नमस्कार! पिछले दर्पण पत्र में हमने हिन्दी दिवस के बहाने भाषा के बारे में बात की थी। इस बार उसी बातचीत को थोड़ा आगे बढ़ाना चाहता हूँ। एक सवाल से— क्या हमें सचमुच हर बात का जवाब तुरंत चाहिए? आज अगर कोई बात याद नहीं आ रही, तो हम खोज लेते हैं। किसी शब्द का अर्थ नहीं मालूम, तो कुछ सेकंड में मिल जाता है। किसी जगह का रास्ता नहीं पता, तो फोन बता देता है। किसी विषय पर जानकारी चाहिए, तो इंटरनेट सामने है। हम ऐसी दुनिया में रहते हैं जहाँ उत्तर (answer) पाने में बहुत कम समय लगता है। लेकिन...
about 1 month ago • 1 min read
प्रिय मित्र, नमस्कार! कल 14 सितंबर है—हिन्दी दिवस। हर साल इस दिन हिन्दी के बारे में बहुत कुछ लिखा जाता है। हिन्दी की महत्ता। हिन्दी का गौरव। हिन्दी का भविष्य। हिन्दी को आगे बढ़ाने की बातें। और शायद यह सब जरूरी भी है। लेकिन इस बार मैं हिन्दी दिवस पर कुछ अलग सोच रहा था। क्या हिन्दी को सचमुच हमारी शुभकामनाओं की जरूरत है? या फिर हमारी रोज़मर्रा की जिंदगी में थोड़ी-सी जगह की? भाषा सिर्फ शब्द नहीं होती हम जब “हिन्दी” कहते हैं, तो क्या सोचते हैं? देवनागरी? कविताएँ? कहानियाँ? कबीर और रहीम? प्रेमचंद?...
about 1 month ago • 1 min read
प्रिय मित्र, नमस्कार! 🙏 पिछले पत्र के अंत में मैंने आपसे एक सवाल पूछा था — अगर जीवन के लिए केवल एक पुरानी भारतीय रचना चुननी हो, तो आप किसे चुनेंगे? जवाब आए, और एक बात देखकर मैं थोड़ी देर रुक गया। आलोक सिंह ने लिखा — श्रीमद्भगवद्गीता। आशीष कुमार दुबे ने लिखा — श्रीमद्भगवद्गीता। संदीप कुमार ने भी वही लिखा। अलग-अलग शहर, अलग-अलग उम्र, एक-दूसरे से कोई परिचय नहीं — और सबकी उँगली एक ही किताब पर। और संयोग देखिए, यह जवाब मेरे पास ठीक उन्हीं दिनों पहुँचे जब जन्माष्टमी थी। जिस ग्रंथ को इतने पाठकों ने...
about 2 months ago • 1 min read
प्रिय मित्र, नमस्कार! 🙏 कुछ दिन पहले रक्षाबंधन था। हर साल की तरह इस बार भी घर-घर में राखियाँ बंधीं, मिठाइयाँ बाँटी गईं और दूर रहने वाले भाई-बहनों ने फोन या वीडियो कॉल के सहारे त्योहार मनाया। मेरे लिए इस बार रक्षाबंधन थोड़ा अलग था। मैं सिडनी में हूँ और मेरी बहन अमेरिका में, इसलिए इस बार भी हमारी राखी वीडियो कॉल के उस छोटे-से पर्दे के पार बंधी। दूरी हजारों किलोमीटर की थी, लेकिन उस कुछ मिनट की बातचीत में लगा ही नहीं कि हम इतने दूर हैं। शायद रिश्तों की खूबसूरती यही है—दूरी उन्हें अलग कर सकती है,...
about 2 months ago • 1 min read
प्रिय मित्र, नमस्कार! 🙏 कभी-कभी हम किसी की सफलता देखते हैं और बिना कुछ कहे अपने जीवन की तरफ देखने लगते हैं। किसी ने हमसे पहले घर खरीद लिया। किसी की नौकरी हमसे बेहतर है। किसी ने अपना कारोबार शुरू कर दिया। किसी की किताब छप गई। और सोशल मीडिया तो हर दिन हमें बता ही देता है कि बाकी लोग हमसे कितनी तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं। फिर मन में एक छोटा-सा सवाल आता है— “मैं कहाँ पीछे रह गया?” पिछले सप्ताह प्रकाशित अपनी एक रचना पर काम करते हुए मैं इसी सवाल पर काफी देर सोचता रहा। शायद परेशानी यह नहीं है कि हम...
2 months ago • 1 min read