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प्रिय मित्र, नमस्कार! पिछले दर्पण पत्र में हमने हिन्दी दिवस के बहाने भाषा के बारे में बात की थी। इस बार उसी बातचीत को थोड़ा आगे बढ़ाना चाहता हूँ। एक सवाल से— क्या हमें सचमुच हर बात का जवाब तुरंत चाहिए? आज अगर कोई बात याद नहीं आ रही, तो हम खोज लेते हैं। किसी शब्द का अर्थ नहीं मालूम, तो कुछ सेकंड में मिल जाता है। किसी जगह का रास्ता नहीं पता, तो फोन बता देता है। किसी विषय पर जानकारी चाहिए, तो इंटरनेट सामने है। हम ऐसी दुनिया में रहते हैं जहाँ उत्तर (answer) पाने में बहुत कम समय लगता है। लेकिन जीवन के कुछ सवाल ऐसे हैं जिनका उत्तर किसी search box में नहीं मिलता। मैं क्या चाहता हूँ? किसी रिश्ते को कैसे संभालूँ? किसी असफलता के बाद क्या करूँ? क्या मैं सही रास्ते पर हूँ? किसी अपने से दूर हो जाने के बाद उस खालीपन को कैसे समझूँ? इन सवालों के जवाब शायद कहीं लिखे हुए मिल जाएँ। लेकिन उन्हें अपने जीवन पर लागू करने में समय लगता है। और शायद यहीं साहित्य हमारे काम आता है। किताबें हमेशा जवाब नहीं देतींहम अक्सर किताब खोलते समय सोचते हैं कि हमें कुछ सीखना है। लेकिन अच्छी किताब कई बार हमें कोई सीधा जवाब नहीं देती। वह सिर्फ एक सवाल हमारे सामने रख देती है। कबीर को पढ़ते हैं तो वे हमें हमारे अपने व्यवहार की ओर देखने को कहते हैं। पंचतंत्र की कहानी पढ़ते हैं तो हम उसके पात्रों के फैसलों पर विचार करते हैं। गीता पढ़ते हैं तो सामने केवल कोई उपदेश नहीं होता—एक ऐसा व्यक्ति भी होता है जो कठिन परिस्थिति में खड़ा होकर अपने ही निर्णय को लेकर उलझा हुआ है। और शायद यही साहित्य की खूबसूरती है। वह हमेशा यह नहीं कहता कि “यह करो।” कभी-कभी वह पूछता है— “तुम होते तो क्या करते?” एक ही किताब, लेकिन हर बार अलग अर्थक्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि आपने कोई किताब बचपन में पढ़ी और फिर कई साल बाद दोबारा पढ़ी? कहानी वही थी। पात्र वही थे। शब्द भी वही थे। लेकिन इस बार कुछ अलग लगा। ऐसा इसलिए नहीं कि किताब बदल गई थी। हम बदल गए थे। बचपन में पंचतंत्र की कोई कहानी केवल मजेदार लग सकती है। बड़े होने पर उसी कहानी में हमें किसी व्यक्ति का व्यवहार दिखाई दे सकता है। कबीर का कोई दोहा स्कूल में केवल याद करने की चीज़ हो सकता है। बाद में वही दोहा हमारे अपने जीवन पर सवाल बन सकता है। यही कारण है कि कुछ किताबों को एक बार पढ़ना काफी नहीं होता। हर उम्र में हम किताब के पास कुछ नया लेकर जाते हैं। एक पाठक ने हिन्दी से आगे की एक कहानी सुनाईहिन्दी दिवस के बाद हमें केरल से V. Rajesh Mohan Rao जी का एक बहुत विचारपूर्ण संदेश मिला। उन्होंने हिन्दी के बारे में सीधे लिखने के बजाय हमें कोंकणी भाषा और संस्कृति (language and culture) की यात्रा के बारे में बताया—गोवा से केरल तक और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक। उनकी बात पढ़ते हुए मुझे लगा कि भाषा की कहानी, चाहे वह हिन्दी की हो, कोंकणी की हो, तमिल की हो या किसी और भारतीय भाषा की—कहीं न कहीं एक जैसी है। भाषा केवल शब्दों को नहीं बचाती। वह स्मृतियों (memories) को भी बचाती है। Rajesh जी ने कोंकणी भाषा के संरक्षण (preservation) में योगदान देने वाले लोगों और विशेष रूप से N. Purushotham Mallya के काम का उल्लेख किया। उन्होंने एक बहुत महत्वपूर्ण बात की ओर ध्यान दिलाया— किसी भाषा को बचाए रखने के लिए केवल उसके पुराने साहित्य और इतिहास को याद करना पर्याप्त नहीं है। उसे अगली पीढ़ी तक पहुँचाना भी जरूरी है। बच्चे उसे बोलें। युवा उसे पढ़ें। लोग उसमें लिखें। और नई तकनीक (technology) के माध्यम से भी उस भाषा में सामग्री उपलब्ध हो। यह बात पढ़ते हुए मैं फिर हिन्दी के बारे में सोचने लगा। क्या हिन्दी को भी यही नहीं चाहिए? सिर्फ हिन्दी दिवस पर हिन्दी की बात करना नहीं। बल्कि हिन्दी को अपने जीवन में इस्तेमाल करते रहना। उसमें पढ़ना। उसमें लिखना। उसमें बातचीत करना। और सबसे बढ़कर—अगली पीढ़ी को उससे जोड़ना। मुझे Rajesh जी की बात में एक और चीज़ बहुत अच्छी लगी। उन्होंने कोंकणी की कहानी को केवल अपनी भाषा तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने दूसरी भारतीय भाषाओं और साहित्य के साथ उसके संबंध की भी बात की। शायद यही भारत की भाषाई विविधता (linguistic diversity) की खूबसूरती है। अलग-अलग भाषाएँ एक-दूसरे से दूर नहीं करतीं। वे एक-दूसरे को और समृद्ध (enrich) कर सकती हैं। भाषा को बचाने से ज्यादा जरूरी है उसे जीनाकभी-कभी हम कहते हैं— “हमें अपनी भाषा बचानी है।” लेकिन शायद सवाल थोड़ा अलग होना चाहिए। “हम अपनी भाषा को अपने जीवन में कितना जी रहे हैं?” क्योंकि कोई भाषा केवल किताबों में रहकर जीवित नहीं रहती। वह बातचीत में जीवित रहती है। घर में। दोस्तों के बीच। कहानियों में। कविताओं में। गीतों में। और उन छोटे-छोटे वाक्यों में जिन्हें हम बिना सोचे बोल देते हैं। इसीलिए हमें लगता है कि हिन्दी साहित्य को डिजिटल दुनिया तक पहुँचाना जरूरी है। हमने वेबसाइट पर कबीर के दोहे, रहीम के दोहे, पंचतंत्र की कहानियाँ, भर्तृहरि नीति-शतक, चाणक्य नीति, विदुर नीति और श्रीमद्भगवद्गीता जैसी रचनाओं को हिन्दी पाठकों के लिए उपलब्ध कराने की कोशिश इसी सोच के साथ की है। पुराने शब्दों को संग्रहालय (museum) में रखने के लिए नहीं, आज के जीवन तक पहुँचाने के लिए। इस सप्ताह एक छोटा-सा प्रयोगआज किसी ऐसी किताब को उठाइए जिसे आपने बहुत पहले पढ़ा था। उसे दस मिनट पढ़िए। लेकिन इस बार एक अलग सवाल के साथ। यह मत पूछिए— “इससे मुझे क्या सीखना चाहिए?” बस पूछिए— “आज यह किताब मुझसे क्या पूछ रही है?”हो सकता है उत्तर न मिले। कोई बात नहीं। शायद उस सवाल के साथ थोड़ा समय बिताना ही इस पढ़ने का सबसे अच्छा हिस्सा हो। अब आपकी बारीपिछले अंक में मैंने आपसे पूछा था कि हिन्दी की कौन-सी किताब, कविता, कहानी या पंक्ति आप चाहते हैं कि अगली पीढ़ी भी पढ़े। इस बार सवाल थोड़ा और व्यक्तिगत है। ऐसा कौन-सा सवाल है जिसका जवाब आपको किसी किताब में नहीं मिला, लेकिन किसी किताब ने उसे समझने में आपकी मदद जरूर की?अगर कोई किताब, कविता, कहानी या दोहा याद आता है, तो हमें उसका नाम बताइए। और अगर संभव हो तो यह भी बताइए कि वह आपके लिए क्यों महत्वपूर्ण है। आपके जवाब केवल हमारे लिए प्रतिक्रिया (feedback) नहीं हैं। वे इस पत्र को एकतरफा newsletter से पाठकों के बीच बातचीत बनाते हैं। शायद आपकी कही कोई बात अगले पाठक को किसी किताब तक पहुँचा दे। और शायद किसी किताब की कोई पंक्ति फिर किसी और के जीवन में अपना रास्ता बना ले। क्योंकि आखिर में साहित्य की यात्रा कुछ ऐसी ही होती है— एक व्यक्ति पढ़ता है। कुछ महसूस करता है। फिर वह बात किसी दूसरे तक पहुँचती है। और इसी तरह शब्द चलते रहते हैं। स्नेह सहित, निशीथ रंजन “साहित्य की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि वह हमें दूसरों की कहानी पढ़ाते-पढ़ाते, हमारी अपनी कहानी समझा देता है।” |
I’ve always been curious about the ideas that shape the way we think, live, work, and grow. Through this newsletter, I want to explore timeless wisdom, philosophy, personal growth, leadership, and the quiet lessons we often find in everyday life.Each edition brings together insights from great thinkers, fresh perspectives, and observations from the world around us. The aim isn’t simply to share ideas, but to look at familiar things a little differently, question what we take for granted, and discover something meaningful along the way.My hope is that every edition leaves you with at least one thought that stays with you, one idea that sparks your curiosity, or one small change in perspective that makes a difference in how you see the world.
प्रिय मित्र, नमस्कार! 🙏 पिछली चिट्ठी में मैंने पूछा था कि रामायण या महाभारत का कौन-सा पात्र आपको सबसे दिलचस्प लगता है, जिसे आम तौर पर खलनायक माना जाता है। आप में से कई लोगों ने जवाब लिखा। शकुनि का नाम आया, दुर्योधन का भी। पर सबसे ज़्यादा बार लौटकर एक ही नाम आया। कर्ण। इन नामों में एक बात साझा है। इनमें से किसी को भी हम पूरी तरह बुरा नहीं कह पाते। और कर्ण को शायद सबसे कम। तो इस बार बात कर्ण की। कर्ण ने यह नहीं चुना था कि वह किसके घर जन्म लेगा, या लोग उसे किस नाम से पुकारेंगे। पर आगे चलकर उसने...
प्रिय मित्र, नमस्कार! 🙏 इस नवरात्रि मैं सिडनी के बॉकहम हिल्स में दुर्गा पंडाल गया था। पूजा हुई, पुष्पांजलि हुई, ढाक बजी, और प्रसाद की वही लंबी क़तार। पर एक चीज़ वहाँ नहीं थी। सिडनी में रावण का पुतला नहीं जलाया जाता। यहाँ इसकी इजाज़त नहीं है। दशहरा और पुतला हमारे मन में साथ-साथ जुड़े हैं, इसलिए पहली बार यह थोड़ा अजीब लगता है। फिर लगता है कि शायद ठीक ही है। क्योंकि पुतला जला देना दशहरे का सबसे आसान हिस्सा है। मुश्किल हिस्सा वह सवाल है, जो आग बुझने के बाद भी खड़ा रहता है। 20 अक्टूबर को दशहरा है।...
प्रिय मित्र, नमस्कार! 🙏 नवरात्रि के दिन हैं। घरों में कलश रखे हैं, कहीं गरबा हो रहा है, कहीं रामलीला की तैयारी चल रही है। इन दिनों एक बात मेरे मन में बार-बार आती है, और आज वही आपसे कहना चाहता हूँ। हमारे यहाँ शक्ति को स्त्री का रूप दिया गया है। यह सिर्फ़ पूजा की बात नहीं है, कल्पना की बात है। जब हमें ताकत की तस्वीर बनानी थी, तो हमने किसे चुना? एक स्त्री को। और यह बात हमारे साहित्य में भी उतनी ही गहरी उतरी है जितनी मंदिर में। 💪 जो पंक्ति सबको याद है एक पंक्ति है, जो शायद आपको भी याद होगी। स्कूल...