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प्रिय मित्र, नमस्कार! 🙏 पिछले पत्र के अंत में मैंने आपसे एक सवाल पूछा था — अगर जीवन के लिए केवल एक पुरानी भारतीय रचना चुननी हो, तो आप किसे चुनेंगे? जवाब आए, और एक बात देखकर मैं थोड़ी देर रुक गया। आलोक सिंह ने लिखा — श्रीमद्भगवद्गीता। आशीष कुमार दुबे ने लिखा — श्रीमद्भगवद्गीता। संदीप कुमार ने भी वही लिखा। अलग-अलग शहर, अलग-अलग उम्र, एक-दूसरे से कोई परिचय नहीं — और सबकी उँगली एक ही किताब पर। और संयोग देखिए, यह जवाब मेरे पास ठीक उन्हीं दिनों पहुँचे जब जन्माष्टमी थी। जिस ग्रंथ को इतने पाठकों ने चुना, उसी के वक्ता का जन्मदिन। पर एक जवाब सबसे अलग था। कबीर आहूजा ने लिखा — "सभी किताबें amazing हैं, एक को चुनना मुश्किल है।" पहली नज़र में यह सवाल टालने जैसा लगता है। पर मैं इसी जवाब पर सबसे देर तक रुका। क्योंकि मेरा सवाल ही शायद गलत था। मैंने आपसे चुनने को कहा था — जैसे ये किताबें आपस में प्रतियोगिता कर रही हों। और शायद उनकी बात उन चार किताबों तक सीमित भी नहीं है। गीता को लीजिए। हम सब उसे जानते हैं — कम से कम हम यही कहते हैं। पर हममें से कितने लोगों ने उसे पहले श्लोक से आख़िरी श्लोक तक पढ़ा है? ज़्यादातर तक वह किसी उद्धरण के रास्ते पहुँची है, या किसी प्रवचन के रास्ते। किसी किताब का नाम जानना और उसे पढ़ लेना, दो अलग बातें हैं। और यह बात सिर्फ़ गीता की नहीं है। 📖 आधी याद रह गई कहानियाँएक छोटा-सा प्रयोग कीजिए। "रहिमन धागा प्रेम का..." — आगे की पंक्ति याद आई? शायद हाँ। और शायद यहीं तक। हम सबके भीतर कुछ ऐसी पंक्तियाँ हैं जिनकी पहली आधी लाइन याद है, दूसरी नहीं। कुछ ऐसी कहानियाँ हैं जिनका अंत याद है, पर शुरुआत नहीं। प्यासा कौआ हमें याद है — पर यह याद नहीं कि वह किस ग्रंथ से आया। यह हमारी कमी नहीं है। यह इस बात का सबूत है कि ये रचनाएँ कितनी गहरी उतरी थीं। बचपन में हमने इन्हें याद नहीं किया था — ये अपने आप भीतर बस गई थीं, दादी की आवाज़ में, स्कूल की किसी किताब के कोने में। पर बसने और समझने में फर्क होता है। कबीर ने खुद यही कहा है — "पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।" और जो पंक्ति बचपन में भीतर बैठ गई थी, उसे वयस्क होकर एक बार पूरा पढ़ना — अर्थ के साथ, शुरू से अंत तक — अपने आप में एक अलग अनुभव है। 📚 इसी सोच से — चार नई किताबेंपिछले कुछ समय से मैं इसी काम में लगा था, और इस सप्ताह चार किताबें तैयार होकर Amazon Kindle पर पहुँच गई हैं। पंचतंत्र की सम्पूर्ण कहानियाँ — पाँचों तंत्रों की सभी चौंसठ कहानियाँ, एक जगह। मित्रभेद, मित्रसम्प्राप्ति, काकोलूकीयम्, लब्धप्रणाश और अपरीक्षितकारक। हममें से ज़्यादातर लोगों ने पंचतंत्र की आठ-दस कहानियाँ सुनी हैं। बाकी चौवन भी उतनी ही अच्छी हैं। कबीर के दोहे — अर्थ सहित और रहीम के दोहे — अर्थ सहित — (कबीर जी, नाम का यह संयोग मुझे आपका जवाब पढ़ने के बाद ही दिखाई दिया।) यहाँ "अर्थ सहित" ही असली बात है। हमने दोहे रटे थे, समझे नहीं थे। हर दोहे के साथ उसका भावार्थ है, ताकि इस बार पंक्ति पूरी भी हो और खुल भी जाए। वेताल पच्चीसी — राजा विक्रमादित्य और वेताल की वे पच्चीस कहानियाँ, जिनके बारे में सुना सबने है और पढ़ी बहुत कम लोगों ने हैं। ये चारों किताबें मैंने वेबसाइट की सामग्री से ही तैयार की हैं — वही जो आप वर्षों से यहाँ पढ़ते आए हैं, अब क्रम में, एक साथ, पढ़ने लायक रूप में। 👉 हमारी सभी eBooks यहाँ देखिए एक बात साफ़ कह दूँ — इन किताबों की लगभग सारी सामग्री वेबसाइट पर मुफ़्त पढ़ी जा सकती है, और आगे भी मुफ़्त रहेगी। किताब वही सामग्री एक जगह, क्रम में, बिना विज्ञापन के रखती है — कुछ जोड़ के साथ। पंचतंत्र में हर कहानी के साथ एक चित्र है, जो वेबसाइट पर नहीं है। दोहे छाँटकर, बिना दोहराव के, अपने शब्दार्थ, भावार्थ और आज के समय में उनकी उपयोगिता के साथ रखे गए हैं। और अगर आपमें से कोई किताब लेता है, तो वह इस वेबसाइट को चलते रहने में सीधे मदद करता है। मैं इसके लिए आभारी रहूँगा — पर यह शर्त नहीं है। पढ़ना पहले भी मुफ़्त था, आगे भी रहेगा। 🌙 वेताल का असली सवालइन चारों में मुझे वेताल पच्चीसी की बनावट सबसे दिलचस्प लगी। शर्त सीधी है — राजा विक्रमादित्य को वेताल को कंधे पर उठाकर चुपचाप चलना है। वेताल रास्ते में एक कहानी सुनाता है और अंत में एक सवाल पूछ देता है। जानते हुए भी चुप रहे, तो राजा का सिर फट जाएगा। और बोल दे, तो वेताल उड़कर वापस पेड़ पर जा बैठेगा — सब कुछ फिर से शुरू। राजा जानता है कि बोलने से यात्रा फिर शून्य पर आ जाएगी। फिर भी वह हर बार बोलता है। पच्चीस बार। मुझे यह हमारे अपने जीवन की बहुत ईमानदार तस्वीर लगती है। कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिनका जवाब देना हमें भारी पड़ता है, फिर भी हम चुप नहीं रह पाते — क्योंकि जानते हुए चुप रहना अपनी तरह की एक मृत्यु है। सदियों पुरानी एक कथा, और सवाल आज भी वही। ✍️ इस सप्ताह आपसेकोई एक कहानी या दोहा, जो आपको आधा याद है — पहली पंक्ति आती है, आगे नहीं। कौन-सा है? इस email का reply करके बताइए। नाम याद न हो तो जितना याद है उतना ही लिख दीजिए। मैं अगले पत्र में कुछ जवाब पूरे करने की कोशिश करूँगा। स्नेह सहित, निशीथ रंजन हिन्दी साहित्य दर्पण "साहित्य की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि वह हमें दूसरों की कहानी पढ़ाते-पढ़ाते, हमारी अपनी कहानी समझा देता है।" |
I’ve always been curious about the ideas that shape the way we think, live, work, and grow. Through this newsletter, I want to explore timeless wisdom, philosophy, personal growth, leadership, and the quiet lessons we often find in everyday life.Each edition brings together insights from great thinkers, fresh perspectives, and observations from the world around us. The aim isn’t simply to share ideas, but to look at familiar things a little differently, question what we take for granted, and discover something meaningful along the way.My hope is that every edition leaves you with at least one thought that stays with you, one idea that sparks your curiosity, or one small change in perspective that makes a difference in how you see the world.
प्रिय मित्र, नमस्कार! 🙏 पिछली चिट्ठी में मैंने पूछा था कि रामायण या महाभारत का कौन-सा पात्र आपको सबसे दिलचस्प लगता है, जिसे आम तौर पर खलनायक माना जाता है। आप में से कई लोगों ने जवाब लिखा। शकुनि का नाम आया, दुर्योधन का भी। पर सबसे ज़्यादा बार लौटकर एक ही नाम आया। कर्ण। इन नामों में एक बात साझा है। इनमें से किसी को भी हम पूरी तरह बुरा नहीं कह पाते। और कर्ण को शायद सबसे कम। तो इस बार बात कर्ण की। कर्ण ने यह नहीं चुना था कि वह किसके घर जन्म लेगा, या लोग उसे किस नाम से पुकारेंगे। पर आगे चलकर उसने...
प्रिय मित्र, नमस्कार! 🙏 इस नवरात्रि मैं सिडनी के बॉकहम हिल्स में दुर्गा पंडाल गया था। पूजा हुई, पुष्पांजलि हुई, ढाक बजी, और प्रसाद की वही लंबी क़तार। पर एक चीज़ वहाँ नहीं थी। सिडनी में रावण का पुतला नहीं जलाया जाता। यहाँ इसकी इजाज़त नहीं है। दशहरा और पुतला हमारे मन में साथ-साथ जुड़े हैं, इसलिए पहली बार यह थोड़ा अजीब लगता है। फिर लगता है कि शायद ठीक ही है। क्योंकि पुतला जला देना दशहरे का सबसे आसान हिस्सा है। मुश्किल हिस्सा वह सवाल है, जो आग बुझने के बाद भी खड़ा रहता है। 20 अक्टूबर को दशहरा है।...
प्रिय मित्र, नमस्कार! 🙏 नवरात्रि के दिन हैं। घरों में कलश रखे हैं, कहीं गरबा हो रहा है, कहीं रामलीला की तैयारी चल रही है। इन दिनों एक बात मेरे मन में बार-बार आती है, और आज वही आपसे कहना चाहता हूँ। हमारे यहाँ शक्ति को स्त्री का रूप दिया गया है। यह सिर्फ़ पूजा की बात नहीं है, कल्पना की बात है। जब हमें ताकत की तस्वीर बनानी थी, तो हमने किसे चुना? एक स्त्री को। और यह बात हमारे साहित्य में भी उतनी ही गहरी उतरी है जितनी मंदिर में। 💪 जो पंक्ति सबको याद है एक पंक्ति है, जो शायद आपको भी याद होगी। स्कूल...